जैसा हमने 2 कुरिन्थियों 5:21 से सीखा कि प्रभु यीशु स्वयं हमारे लिए पाप ठहरे, कि हम परमेश्वर की धामिर्कता बन जाए । इसे देख मेरे मन में एक प्रश्न उठता है कि परमेश्वर ( जो अति महान हैं ) हमसे क्यों ऐसा अद्दभुत प्रेम करते हैं कि हमें धर्मी ठहराने के लिए क्रूस की मृत्यु और शर्मिंदगी उसने सह ली । क्या हम उसके लिए बहुत मूल्यवान हैं ?
जी हाँ, मेरे प्यारे मित्रों - परमेश्वर की दृष्टि में " हम मूल्यवान हैं " और बिना किसी शर्त के प्रेम किए गए हैं । बहुत बार हम ऐसा अनुभव करते हैं कि हमें प्रेम करने वाला, हमारी चिन्ता करने वाला कोई नहीं - मैं खुद भी इससे संघर्ष करती हूँ - परमेश्वर ने इसे समझने में मेरी सहायता की, कि समस्या "हमारे" या "मेरे स्वंय "के सोचने या अनुभव करने में नहीं, पर "वास्तविकता" क्या है जानने में है । मनुष्य का प्रेम सोच विचार करने वाला होता है जो अगले के हाव-भाव और उसके कार्य छमता पर सराहा जाता है । चूँकि हम सभी इस समस्या से संघर्ष करते हैं, तो एक दूसरे को आहत ( चोट) करते हैं ।
पर परमेश्वर का प्रेम बिलकुल अलग है , परमेश्वर हमसे प्रेम करने के लिए हमारी कार्य छमता या अच्छाईयो को नहीं देखता । वह हमसे प्रेम करता है क्योंकि उसने हमें सृजा है और बनाया है । उसने अपने प्रेम को उस क्रूस पर सिद्ध किया - इससे बड़ा और कोई प्रेम नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपनी जान दे ।
यह जरूरी है कि हम अपना ध्यान परमेश्वर के वचनों पर केंद्रित करना आरम्भ करें, न की उस पर कि हम क्या अनुभव करतें हैं । विश्वास द्वारा हम परमेश्वर के प्रेम को पा सकतें हैं और यही अन्त में हमें सुधारेगा ( सिद्ध करेगा )। तब हम दूसरों से ( उनके अवगुण के बावजूद ) प्रेम करने के आनन्द को समझ सकेंगे, जैसा परमेश्वर हमसे करता है ।
हम प्रेम करते हैं क्योंकि वे हमसे प्रेम करता है ।


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